रिक्शे की सवारी

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एक रिक्शे वाला जब सवारी देखता है , लपककर पहुंच जाता है। मैडम कहाँ जाना है , आ जाओ हम घर तक छोड़ेंगे। उम्र का अनुमान ये ही कोई साठ वर्ष होगा। घर जाने के लिए मैं प्राय: रिक्शा ही लेती हूँ। क्योंकि उसकी रफ़्तार धीमी होती है और आपको समय मिलता है , अपने आस-पास की दुनिया के लिए। परन्तु उस दिन मेरी दोस्त मेरे साथ थी , तो हम रिक्शेवाले को अनदेखा कर आगे चल पड़े और ऑटो लेने की सोचने लगे। तभी रिक्शेवाले ने बोला , मैडम मैंने आपको पहले पूछा था। और ऑटोवाला उसे धमकाने लगा , तब मैंने भी झूठ बोल दिया कि मैंने रिक्शे वाले अंकल को हाँ की है तो हम उन्ही के साथ जायेंगे। दुबला -पतला , काला पड़ा हुआ शरीर , कितना श्रम करना पड़ता है इन्हे रिक्शा खींचने में। उस से भी ज़्यादा मेहनत सवारियां जुटाने में। तेज़ रफ़्तार वाले शहर में मोटर गाड़ियों के होते कौन रिक्शा लेता है। तो ज़ाहिर सी बात है कि उन्हें सवारी को आकर्षित करने के लिए रेट भी कम रखने पड़ते है। लेकिन क्या शारीरिक श्रम की ये ही क़ीमत बनती है कि उसके सपने भी कल की रोटी की चिंता के हो। अगर हम युवा अपनी लाइफ से तुलना करें तो नो वीकेंड।

रास्ते में चलते हुए मैंने पूछ ही लिया , परिवार कहाँ रहता है ?
“मैडम बिहार से आये है हम तो , ये ही रोज़ी-रोटी कमाने , परिवार भी वहीं रहता है। ”
वह बेटों वाला था, कमा भी रहे थे। फिर भी इस उम्र में रिक्शा चलाने की क्या मजबूरी थी ? क्या इसी दिन के लिए हमारे समाज में तीन-चार बेटियों के बाद भी इंसान पुत्रों का सपना देखता है।
“आपके बेटे आपकी सहायता नहीं करते , इस उम्र में ऐसा काम ?”
“नहीं बेटा , ऐसा नहीं है। लेकिन जो इंसान अपने पैरों पर खड़ा हो ,वो सिर उठाकर चल सकता है। और बेटों के पास रहता तो शायद कुत्तों से कुछ बेहतर ज़िंदगी होती मेरी,अब घर पड़े को कोई कितना दुत्कार सकता है। एक उम्र आने पर रिश्तों में भी वो बात नहीं रहती। ”
“आप कैसे कह सकते हैं , आपने कभी रहकर देखा है ?”
“हाँ , अब उनकी नज़रों में फ़र्क आ गया है। किसी की नज़र में खटकने से बेहतर है, जबतक हाथ -पैर काम करते हैं ,कमाओ और खाओ।”

हमारी बात-चीत ख़त्म ही नहीं हुई की मेरा घर आ गया। तभी चलते-चलते मैंने ऑटो वाली बात भी पूछ ही ली।
“वो ऑटो वाले भैया आपको क्यों धमका रहे थे ?”
“अब बेटा हमारी तो साईकिल है धीऱे चलती है , और लाइन में भी हमें उनके बाद खड़ा होना पड़ता है। अब आप ही बताओ हम क्या करें हमें भी तो अपनी रोटी कमानी है , अब आपके सामने मैंने आपको बोला तो वो हमें कैसे धमका रहा था। आज आप हमारे साथ आ गए ,अब वापिस जाने पर वो हमें फटकार लगाएंगे कि हमारी सवारी ले गया। ऑटो वाले सब मिले होते हैं और हम अकेले , ऐसे में हम क्या करें बताओ ?”
मैंने उन्हें पच्चास रूपये निकालकर दे दिए और वो चले गए।

अब अगर हम हिसाब लगाने बैठें तो ये समाज के वो लोग हैं , जो पूरा दिन धूप , ठण्डी , बरसात में शारीरिक मेहनत करने के बाद भी मुश्किल से 200-250 रूपये कमाते हैं। सवारी ना मिलें तो इसका भी भरोसा नहीं। नो इंश्योरेंस , नो जॉब सिक्योरिटी , नो लाइफ सिक्योरिटी। दूसरे शहरों में अकेले रात को दुकानें बंद होने पर उनके कॉरिडोर में खाना बनाते हैं और वहीं रैन – बसेरा करते हैं। ये कहानी पुराने जमाने की नहीं 2018 की है। आप खुद सोच सकतें हैं आज़ादी के 71 वर्ष बाद भी हम अपने लोगों को खाने-पीने की सुविधा नहीं उपलब्ध करवा पाएं है , तो चिकित्सा और शिक्षा की बड़ी बातें तो फ़िजूल हैं।

8 comments

  1. गांव में जिनके चलते हुकम और सरदारी,
    शहर में आ के हो जाते हैं बस की एक सवारी ।

    Very well written. It’s scary and sad that so many people have to leave everything behind just to be able to survive.

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