अनकहा राज़

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देखती हूँ जब कभी-कभी
तुम्हारे बचपन की तस्वीर
आँखों में वो हंसी
मासूमियत ,जज़्बात
गालों पे लाली , वो दमक
आज न जाने वो कहाँ ग़ुम है
शायद खो दी तुमने दुनिया की उलझन में
मुरझा गया वो हँसता चेहरा
जो कभी बोलता था
धुंधला गयी वो रौनक़
आँखों का तेज़
ऐसा क्या हुआ ?
जो सूख गया आँखों का पानी
फ़ीकी पड़ गयी वो चमक
लेकिन अभी भी कहीं अंदर
जिन्दा है एक बचपन
पर वो सहमा है
दुनिया की मार से
ज़िंदगी के काल -चक्र से
पर मुझे आज भी लगता
कुछ गहरा राज़ है
उन आँखों में
जो वो खोलना चाहती है
बोलना चाहती है
रोना चाहती है
बिल्कुल बचपन जैसी
मासूमियत के साथ
पर न जाने
किससे डरती है !!

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