हमें प्यार नहीं नफरत सिखाई जाती है.. { Part 1}

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कुछ बातें ऐसी होती हैं, जिन्हें आप शायद कभी नहीं भूला सकते। वो एक उदाहरण बनकर बार-बार आपके सामने आती रहती है। पिछले इतने दिनों से मैनुअल स्कावेंजर की खबर चल रही है। ज्यादा कुछ नहीं उनके बेसिक राइट और जोखिम भरे काम को करने के लिए उनकी सेफ्टी की मांग है। लेकिन मीडिया और लोगों की तरफ से भी उनके हक के लिए कोई ज्यादा अच्छा रिस्पान्स देखने को नहीं मिल रहा है। क्योंकि शायद ये सब हमें सिखाया ही नहीं गया है । हमारी परवरिश में हमारा कचरा ढोने वाले को इज्जत देना ।
इसे मैं अपना खुद का निजी उदाहरण देकर बता रही हूं। करीब सात साल पुरानी बात है। मैं अपने नाना-नानी साथ आरसीपी टिब्बा कॉलोनी, सूरतगढ़, राजस्थान में रहती थी। पता इसलिए लिख रही हूं, जिससे पढ़ने वालों को थोड़ा एरिया का अनुमान लग जाए।
हमारी सरकारी कॉलोनी थी । कॉलोनी में रहने वाले लगभग सभी लोग सरकारी कर्मचारी ही थे। उस दौरान भी एक दो परिवार को छोड़ के सबका पे-स्केल तीस से पचास हजार और इससे ज्यादा का था।
मेरे घर से तकरीबन एक-डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर अलग से वाल्मीकि, दलित समुदाय का मोहल्ला था । जिन्हें हमारे एरिया में भंगी और जमींदार बुलाते थे। उनके मोहल्ले में बस उन्हीं के समुदाय के लोग रहते थे। ये मिलजुल कर साथ रहने वाला ज्ञान शायद वहां एप्लाई नहीं होता।
इसी भंगी मोहल्ले में एक आदमी रहते हैं। उम्र ये ही होगी साठ वर्ष और इससे ज्यादा । काला रंग, छोटा-सा कद । महिने की शुरूआत में अपनी कमाई लेने के लिए मेरे घर के बाहर से ही बाबू जी…बाबू जी आवाज लगाते थे । श्याम (बदला हुआ नाम) हमारे घर के आगे वाले एरिया में झाडू लगाने का काम करते थे। अकेले हमारे नहीं मोहल्ले के सभी घरों के आगे सफाई करने की जिम्मेदारी श्याम की थी। महिने की तनख्वाह एक घर से 10 रुपये । जिसका मेरे वहां रहते कभी इन्क्रीमेंट भी नहीं लगा । इसके अलावा मोहल्ले में कभी भी घर में जरूरत पड़ने पर गटर की सफाई के लिए भी श्याम को ही बुलाया जाता था । मुझे याद है मेरे खुद के घर में गटर की सफाई के लिए श्याम और उनके बेटे आते थे। जिसमें एक बच्चा था । उनके पास सफाई के औजार के नाम पर एक कस्सी, बट्ठल और बाल्टी थी। ना प्लास्टिक के जूते, ना दस्ताने, ना ही मास्क। अपने हाथ से मल की सफाई करनी और उसे बाल्टी में भरकर बाहर फेंकना । मैने अपनी आंखों से पूरी सफाई होते कम ही देखी हैं । क्योंकि जब भी पीछे सफाई होती थी मेरी नानी मुझे अंदर भेज देती थी । बाहर से दरवाजा बंद होता था। जिससे जितना हो सके बदबू घर में ना आए । शायद तब कभी इतना मैने भी नहीं सोचा था कि उस बदबू में कोई इंसान काम कर रहा है। उन्हीं बदबू वाले गंदे हाथों से खाना भी खा रहा है। उनकी ‘लाइफ सेफ्टी’ शब्द की तो उन्हें शायद समझ ही नहीं होगी। मुझे भी नहीं थी। हमारा समाज ही इतना इनह्यूमन है कि समझने का मौका भी नहीं दिया कभी। क्योंकि ये उन्हीं की जाति का काम है, जो वो हमेशा से करते आए हैं। अपने इस काम के वो 150-200 रुपये लेते थे। इसी छुटपुट कमाई से उनका घर चलता था।
उनकी घर की हालत के बारे में थोड़ा और बता देती हूं। उनके घर में श्याम के अलावा उनकी पत्नी, दो लड़के, एक लड़की, लड़के की पत्नी और उनके शायद दो बच्चे थे। जो नाबालिग उम्र में ही हुए थे। पढ़ाई-लिखाई से ये परिवार कोसों दूर था। क्योंकि सरकारी योजनाएं भी शायद सरकारी दफ्तरों तक ही रह जाती है।
मेरे मोहल्ले के लोगों और श्याम के मोहल्ले के लोगों के बीच एक दिवार थी। जिसे जाति की दिवार बोलो या नफरत की एक ही बात है। क्योंकि ना वो हमारे घर आ सकते थे। ना वो हमारे घर में बैठकर खाना खा सकते थे। ना हम उनसे हाथ मिलाते थे, ना गले मिलते थे। एक बाबू जी और नौकर से ज्यादा हमारे बीच कोई रिश्ता नहीं था। इस समाज के बारे में मुझे जितना समझ आता, वो ये था कि उच्च जाति में पैदा होना मतलब जन्मजात ही बिना किसी एचीवमेंट के सम्मान। वहीं उनकी जाति ‘भंगी’ जिसे हमारे समाज के लोग गाली या स्लैंग वर्ड में इस्तेमाल करते हैं। ये हमारे दरमियां नफरत ही सबसे बड़ा कारण है कि अभी भी उनके बच्चे स्कूल नहीं जाते। वो ये काम नहीं भी करना चाहते तो भी उन्हें करना पड़ता है, अपना पेट भरने के लिए। हमारे सो कॉल्ड एटिट्यूड ने कभी उनमें ये हिम्मत ही नहीं पैदा होने दी कि उन्हें कम से कम अपनी सुरक्षा के लिए तो आवाज उठानी चाहिए।
* इसमें मैन्युअल स्कावेंजर का नाम इसलिए बदला गया है, क्योंकि अभी मैं सूरतगढ़ से बाहर हूं। उनसे बात किए बिना ये आर्टिकल लिखा गया है।

4 comments

  1. एक अनोखी और एक अलग सोच है ये, जिसको आम इंसान अक्सर नज़रअंदाज़ कर देता है, उस विचार को तुमने बड़े ही खूबसूरती के साथ अपने शब्दों में संजोया है ।।

  2. मानवीय गरिमा को सुनिश्चित किया जाना चाहिए। यह समुदाय और उसके नेतृत्व को देखना होगा कि यह कैसे होगा?

  3. सही लिखा कविता। जब तक जाति को काम से और दिमाग से जाति के कीड़े को नहीं निकाला जाता हालात कुछ ख़ास नहीं बदलने वाले। गटर और मल साफ करने वालों को अभी भी इंसान से बहुत बहुत छोटे जीव की तरह देखा जाता है भारतीय समाज में। पालतू या राह चलते जानवर तक लोगों को क्यूट लग सकते हैं, पर इन लोगों के लिए न किसी के पास संवेदना है न प्यार।

  4. कड़वी सच्चाई यही हैं। हम सबने बचपन से अब तक अपने आसपास यही सब होते देखा हैं, जिसमें मुझे तो लगता नहीं की पिछले 2-3 दशकों में कोई बदलाव आया हो। जब तक हमारे दिमाग़ में तथाकथित छोटी-बड़ी जाति का वाइरस घुसा रहेगा तब तक कहा नहीं जा सकता की कितना बदलाव हो पाएगा। अधिकतर लोग तो सही मायनों में इन्हें इंसान भी नहीं समझते।

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