सिर्फ़ मेरी

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एक बार मैं अपने यहां किसी रिश्तेदार के शादी समारोह में शामिल होने गई थी। दुल्हा-दुल्हन का स्टेज प्रोग्राम चल रहा था। जिसमें दोस्त, सगे-संबंधी सब शगुन का लिफाफा/गिफ्ट देते हैं और सबकी उनके साथ फोटो होती हैं। सब लोगों की नजरें भी दुल्हन के बाद वहां की औरतों पर ही होती है। किसने क्या पहना है। पहना है तो कितने का पहना है। इसी होड़ में सब एक से एक सुंदर बनकर आई होती हैं। सबको शौक होता है हम स्टेज पर जाएं और हमारी सुंदर ड्रेस में फोटो हो। खुद को ऊपर से लेकर नीचे तक सजाने में हमने जो मेहनत की है वो दिखे सबको। वो स्टेज पर जाती है अपने पत्ति और बच्चों के साथ। लेकिन आप उनका चेहरा नहीं देख सकते। आप सिर्फ उनकी सुंदर ड्रेस और गहने देख सकते हो। उनका चेहरा उनकी भारी भरकम कढ़ाई वाली ओढ़नी के पीछे छिपा होता है। इसी बीच मेरे ही उम्र का कोई बच्चा बीच में टोक देता है, ‘ताई फोटो गो के फायदो, बिना शक्ल गै! चेहरो तो दिखा दे कैमरा मै! ताई लड़के को देखकर बोलती है, ‘ आजकल गा टाबर’ और फिर पता नहीं क्या सोच के अपना पल्लू थोड़ा ऊपर माथे तक ले लेती है। अगर वो जगह उसका ससुराल होता है तो स्टेज से नीचे उतरने से पहले आपको उनका चेहरा दिखना बंद हो जाएगा।
अफसोस! इन चेहरा छिपाने वाली और माथे तक पल्लू रखने वाली औरतों में पढ़ी-लिखी महिलाएं भी होती हैं। जिनमें ज्यादातर किसी स्कूल की टीचर होती हैं। जो बच्चों को आज़ादी और महिला सशक्तीकरण के पाठ पढ़ाती हैं।
इससे ही जुड़ा एक और वाक़या है। गर्मियों का समय था। मैं ट्रेन में थी। दिल्ली से चंडीगढ़ जा रही थी। इसी सफ़र में मेरे बगल वाली सीट में एक मुस्लिम महिला बैठी थी। जो मुंबई की रहने वाली थी। वो अपनी बहन के परिवार के साथ शिमला घूमने जा रही थी। मेरे साथ वो अकेली बैठी थी। उनका परिवार आगे अलग बैठा था। शायद एक साथ सीट नहीं मिली होगी। उस दौरान जुलाई का महिना था। दिल्ली वो पहली बार आई थी। लेकिन मैनें पूरा दिल्ली घूमा था। इसलिए मैं थोड़ा ज्यादा उत्सुक थी । कहां-कहां घूमें, ये देखा वो नहीं देखा जैसे मेरे सवाल शुरू हो गए। वो भी मुझे अपनी दिल्ली के दो दिनों की कहानियां सुनाने लगी। दिल्ली-मुंबई के खाने के स्वाद से लेकर लोगों के व्यवहार में फ़र्क तक की बातें हुईं। उन्होंने मुझे महाराष्ट्र के रोजमर्रा के कुछ शब्द सिखाए। जिससे मैं कभी मुंबई जाऊं तो ऑटो-टैक्सी में मुझे कोई परेशानी ना हो। ऐसा होता है, जब आप अकेले सफ़र में किसी अनजान से बात करते हों। अगर आप महिला हैं तो उस शहर में आपकी सेफ्टी की बात जरूर होती है। इन्हीं सबके बारे में हम कोई तीन घंटे बातें करते रहें। इसी बीच उन्होंने बोला- आप मुंबई जरूर आएं मुझसे मिलने, अब तो आप हमारी दोस्त हैं।
दोस्ती में एक-दूसरे के प्रति हमदर्दी होना लाज़मी हैं। शायद इसलिए मैनें बोल दिया, इतनी गर्मी है आज। आपने सूट के ऊपर बुर्का पहना है। आपको गर्मी नहीं लग रही ? वो पहले तो मुझे देखकर मुस्कुराईं फिर बोली, आप तो हरियाणा-राजस्थान से हैं। वहां अभी इससे ज्यादा टैम्परेचर होगा। आपकी मम्मी भी घूंघट निकालती होगीं। उन्हें गर्मी नहीं लगती! मैनें भी मुस्कुराहट का जवाब मुस्कुराहट से ही दे दिया।
* फोटो साभार – pinterest.

One comment

  1. स्त्री को अपना समाज बनाना होगा, उसके लिए संघर्ष करना होगा। आर्थिक आज़ादी ही वह नींव है जिस पर खड़े होकर वह इस सामंतवादी ढांचे पर चौतरफा हमले कर पायेगी। आधुनिकता का थोथा लिबास ओढ़े इस रूढ़िवादी समाज में जी रही नारी की दशा का सटीक वर्णन किया है आपने।

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