क्यों…

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तपता है जब थार की धूप सा मन
न बादल , न दरिया , न झरना कोई
एक बूँद की आस नहीं
थक जाते जब ढूँढ – ढूँढ कर जल
तब तुम ओस-सी बूँद बन आते हो
तुम क्यों आस की किरन बन
रोज़ ख़ाब में आते हो

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