आज़ादी

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देख रहा हूँ मैं
तुम किस तरह शोषण कर रहे हो ,
मेरी मज़दूर और मजबूर मा का ,
दिन-रात मेहनत के बावज़ूद ,
किस तरह गुलामी की जंजीरों ने जकड़ा है उसे !

देख रहा हूँ मैं
वह आती है रोज़ कमर झुकाये
तुम्हारी इन दस मंजिला इमारतों में
कन्धों पर अपने बच्चों का बोझ लिए ,
नंगे पांव बिकने के लिये !
दिन भर ढोयेगी ईंट, रेत, बजरी
पेट में जलती आग के लिए ,
कानों में पड़ती बच्चे की चीख़ के लिए !

दिन रात धुप में झुलसेगी
पाव भर दाल-भात, आटे और तेल के लिए ,
उसका बदन काला पड़ रहा है
हाथ खुरदुरे हो चुके हैं ,
नाख़ून कट चुके हैं ,
एड़ियां फट चुकी हैं ,
अब उसके पसीने से
मैं सींच रहा हूँ खुद को ,
लेकिन तुम्हारे आँख-कान बंद है !

देख रहा हूँ मैं
तुम किस कदर गिर चुके हो
तुम्हारा ईमान दब चुका है
इस पत्थर की ईमारत के नीचे ,
एक दिन आएगा
जब हमारे बिना
तुम उठ नहीं पाओगे
रोओगे, चिल्लाओगे, कराहोगे
उस दिन हम मज़दूर संगठित होंगे
शिक्षित होंगे
और
आज़ाद होंगे तुम्हारी
इन ज़ुल्म की बेड़ियों से !

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